Thursday, February 26, 2015

शंक का महत्व और इतिहास |

शंख का इसिहास   

समुंद्र मंथन से प्राप्त चौदह रत्नों में एक रत्न शंख भी हैं | जैसे माता लक्ष्मी सागर से उत्पन्न हुई थी उसी प्रकार शंख भी समुंद्र से उत्पन्न हुआ था इसीलिए इसे माता लक्ष्मी का भाई भी कहा जाता हैं | माता लक्ष्मी और भगवन विष्णु दोनों ही अपने हाथों में शंख धारण करते है जिससे इसे हिन्दू धर्म में बहुत शुभ माना गया है |
एसा माना जाता है जिस घर में शंख होता है उस घर में शुख - समृद्धि आती है |
शंख में एसी खूबियाँ है जो वास्तु संबंधी कई समस्याओं को दूर करके घर में सकारात्मक उर्जा को आकर्षित करता है जिससे घर में खुसी का माहोल रहता हैं | शंख की ध्वनि जहाँ तक पहुंचती है वहाँ तक की वायु शुद्ध और उर्जावान हो जाती हैं | भगवन की पूजा मैं शंख बजने का यह उद्देश होता हैं की आस-पास का वातावरण शुद्ध हो जाये |

शंख के प्रकार 


शंख के मुख्यतः तीन प्रकार प्रकार होते हैं - वामावर्ती, दक्षिणावर्ती तथा गणेश शंख।

वामावर्ती शंख का प्रयोग सबसे ज्यादा होता है। इसका उपयोग पूजा अनुष्ठान और अन्य मांगलिक कार्यों के समय बजाने व कहीं-कहीं सजावट के लिए किया जाता है। इसे प्रातः और सायं काल आरती के पश्चात बजाने की प्रथा है। इसे दो प्रकार से सीधे होठों से व धातु के बेलन पर रखकर बजाया जाता है जिन्हें क्रमशः धमन व पुराण कहते हैं।

दक्षिणावर्ती शंख को लक्ष्मी का साक्षात स्वरूप माना जाता है। यह अत्यंत मूल्यवान होता है और सर्वत्र सुलभ नहीं होता। यह दाईं ओर से खुला होता है। इस शंख के दो भेद होते हैं - पुरुष और स्त्री। यह बजाने के काम नहीं आता। घर में लक्ष्मी के स्थिर वास तथा अन्य वांछित फलों की प्राप्ति के लिए इसकी स्थापना की जाती है।

दक्षिणावर्ती शंख

                           दक्षिणावर्ती शंख

गणेश शंख पिरामिडनुमा होता है। इसकी स्थापना और पूजा ऋण तथा दरिद्रता से मुक्ति और विद्या की प्राप्ति हेतु की जाती है। गणेश इन सभी कार्यों के देव हैं इसलिए इसे गणेश स्वरूप माना गया है।

                                गणेश शंख



शंख वादन के अन्य लाभ भी हैं


इसे बजाने से सांस की बीमारियों से छुटकारा मिलता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से शंख बजाना विशेष लाभदायक है। शंख बजाने से पूरक, कुंभक और प्राणायाम एक ही साथ हो जाते है । पूरक सांस लेने, कुंभक सांस रोकने और रेचक सांस छोड़ने की प्रक्रिया है। आज की सबसे घातक बीमारी हृदयाघात, उच्च रक्त चाप, सांस से संबंधित रोग, मंदाग्नि आदि शंख बजाने से ठीक हो जाते हैं। घर में शंख वादन से घर के बाहर की आसुरी शक्तियां भीतर नहीं आ सकतीं। यही नहीं, घर में शंख रखने और बजाने से वास्तु दोष दूर हो जाते हैं। दक्षिणावर्ती शंख सुख-समृद्धि का प्रतीक है। इसका मुख ऊपर से बंद होता है। घर के मंदिर में इसकी स्थापना करने पर लक्ष्मी की प्राप्ति और व्यवसाय में लाभ होता है | दक्षिणावर्ती शंख  से भगवान सर्यू को जल का अघ्र्य देने  से  मानसिक तथा शारीरिक कष्टों का निवारण होता  है और नेत्र विकार से मुिक्त मिलती है।

Saturday, February 7, 2015

क्या आप जानते हैं कि देवाधिदेव महादेव के पाँच मुखों का क्या रहस्य है ?

पंचमुखी शिवलिंग (चित्रकूट)
पंचमुखी महादेव के दर्शन काफी दुर्लभ है क्योंकि अधिकांशतः महादेव की शिवलिंग रूप में ही पूजा की जाती है| परन्तु देवाधिदेव महादेव के प्रतीकात्मक रूप से पाँच मुख हैं तथा, दुर्वासा ऋषि द्वारा रचित शैवागम शास्त्रों में इनकी विस्तृत व्याख्या है |
महादेव के ये पांचो मुख  हमारी प्रकृति के मूल पाँच तत्वों के प्रतीक हैं यथा जल, वायु, आकाश, अग्नि, एवं पृथ्वी |
और अब यह वैज्ञानिक रूप से भी सिद्ध है कि प्रकृति इन्ही पांच मूल तत्वों से मिलकर बनी है|
साथ ही ध्यान देने योग्य बात यह है कि  व्यवहारिक रूप से योग साधना करने वाले सभी योगियों को पंचमुखी महादेव के दर्शन गहन ध्यान में एक श्वेत रंग के पंचमुखी नक्षत्र के रूप में होते हैं जो , एक नीले आवरण से घिरा होता है तथा, यह नीला आवरण भी एक सुनहरे प्रकाश पुंज से घिरा होता है
इस तरह ध्यान साधना में योगी पहले उस सुनहरे आवरण को फिर नीले प्रकाश को फिर उस श्वेत नक्षत्र का भेदन करता है
इस तरह  उसकी स्थिति कूटस्थ चैतन्य में हो जाती है परन्तु, यह योगमार्ग की सबसे बड़ी साधना है
दरअसल. यह हमारे पुरे ब्रह्माण्ड में फैला अनंत विराट श्वेत प्रकाश पुंज ही क्षीर सागर है. जहां, भगवान नारायण निवास करते हैं
इन्ही श्वेत., नीले एवं सुनहरे प्रकाश पुंजों को आप शिवजी के तीन नेत्र कह सकते हैं जिसमे से  सुनहरे रंग के प्रकाशपुंज को प्रभु महाकाल का तीसरा नेत्र कह सकते हैं जो कभी कभार ही खुलता है और बेहद विध्वंसक होता है
अगर मैं इसे आध्यात्म से इतर शुद्ध वैज्ञानिक भाषा में बताऊँ तो  प्रभु महाकाल के तीसरे नेत्र का सुनहरा रंग अंतरिक्ष में तारा विस्फोट ( सुपरनोवा ) से पैदा होने वाली सुनहरी प्रकाश पुंज है जो किसी भी चीज को जला डालने की क्षमता रखती है तथा लाखों प्रकाश वर्ष प्रति सेकेण्ड की गति से आगे बढती है
यह हम हिन्दू सनातन धर्मियों के लिए कितने गर्व और ख़ुशी की बात है कि आज से लाखों साल पहले ही हमारे ऋषि-मुनियों को सुपरनोवा एवं गामा किरणों तथा उसकी विध्वंसक शक्तियों का सम्पूर्ण ज्ञान था और, उन्होंने देवाधिदेव महादेव के त्रिनेत्र के माध्यम से इसकी बिलकुल सटीक व्याख्या की थी

परन्तु यदि  इसी बात को मैं आध्यात्म के सहारे समझाने का प्रयास करूँ तो
"ॐ तत् सत्" ही तीनों रंगों का प्रतीक है जिसमे से सुनहरा प्रकाश ॐ है   क्योंकि, यह वह स्पंदन है जिससे समस्त सृष्टि बनी है
साथ ही नीला रंग “तत्" यानि कृष्ण-चैतन्य या परम-चैतन्य है
एवं  'सत्' श्वेत रंग स्वयं परमात्मा का प्रतीक है
यहाँ तक कि हम हिन्दुओं के इसी मान्यता को आधार बनाकर. ईसाई मत में भी  'Father', 'Son' and the 'Holy Ghost' इन तीन शब्दों का प्रयोग किया गया गया है
दरअसल  यह और कुछ नहीं बल्कि यह 'ॐ तत्सत्' का ही व्यवहारिक अनुवाद है
जिसमे
Holy Ghost का अर्थ ॐ है,
Son का अर्थ है कृष्ण-चैतन्य,
और,
Father का अर्थ है स्वयं परमात्मा अर्थात , देवाधिदेव महादेव |
बहुत बहुत धन्यवाद !!!!



Sunday, February 1, 2015

शिवलिंग पर दूध क्यों चढ़ाते हैं ??

__________________________________________________________________________शिव जी संहारकर्ता हैं, इसलिए जिन चीज़ों से हमारे प्राणों का नाश होता है, मतलब जो विष है, वो सब कुछ शिव जी को भोग लगता है 
______________________________________________________________________आयुर्वेद कहता है कि वात-पित्त-कफ इनके असंतुलन से बीमारियाँ होती हैं और श्रावण के महीने में वात की बीमारियाँ सबसे ज्यादा होती हैं | श्रावण के महीने में ऋतू परिवर्तन के कारण शरीर मे वात बढ़ता है. इस वात को कम करने के लिए क्या करना पड़ता है ? ऐसी चीज़ें नहीं खानी चाहिएं जिनसे वात बढे, इसलिए पत्ते वाली सब्जियां नहीं खानी चाहिएं ! और उस समय पशु क्या खाते हैं ?
 सब घास और पत्तियां ही तो खाते हैं. इस कारण उनका दूध भी वात को बढाता है ! इसलिए आयुर्वेद कहता है कि श्रावण के महीने में (जब शिवरात्रि होती है !!) दूध नहीं पीना चाहिए. इसलिए श्रावण मास में जब हर जगह शिव रात्रि पर दूध चढ़ता था तो लोग समझ जाया करते थे कि इस महीने मे दूध विष के सामान है, स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है, इस समय दूध पिएंगे तो वाइरल इन्फेक्शन से बरसात की बीमारियाँ फैलेंगी और वो दूध नहीं पिया करते थे ! इस तरह हर जगह शिव रात्रि मनाने से पूरा देश वाइरल की बीमारियों से बच जाता था|
 बरसात में भी बहुत सारी चीज़ें होती हैं लेकिन हम उनको दीवाली के बाद अन्नकूट में कृष्ण भोग लगाने के बाद ही खाते थे (क्यूंकि तब वर्षा ऋतू समाप्त हो चुकी होती थी).एलोपैथ कहता है कि गाजर मे विटामिन ए होता है आयरन होता है लेकिन आयुर्वेद कहता है कि शिव रात्रि के बाद गाजर नहीं खाना चाहिए इस ऋतू में खाया गाजर पित्त को बढाता है !
ज़रा गौर करीये, हमारी परम्पराओं के पीछे कितना गहन विज्ञान छिपा हुआ है ! ये इस देश का दुर्भाग्य है कि हमारी परम्पराओं को समझने के लिए जिस विज्ञान की आवश्यकता है वो हमें पढ़ाया नहीं जाता और विज्ञान के नाम पर जो हमें पढ़ाया जा रहा है उस से हम अपनी परम्पराओं को समझ नहीं सकते ! जिस संस्कृति की कोख से मैंने जन्म लिया है वो सनातन है, विज्ञान को परम्पराओं का जामा इसलिए पहनाया गया है ताकि वो प्रचलन बन जाए और हम भारतवासी सदा वैज्ञानिक जीवन जीते रहें ! हमें अपनी परमपराओं पर गर्व है और हमेशा रहेगा.
Share करना ना भूले !! धन्यवाद !